आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर ट्रीटमेंट एंड रिसर्च इन्टीट्यूट ट्रस्ट पीबीएम को पहुंचा रहा है लाखों का नुकसान
बीकानेर। संभाग के सबसे बड़े पीबीएम अस्पताल में भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। जिसकी शिकायतें संभागीय अ ायुक्त कार्यालय तक पहुंचने के बाद भी अस्पताल प्रशासन मूक दर्शक बना बैठा है। एक ओर मामला आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर सेन्टर का सामने आया है। जहां सरकारी नियमों को धता बताकर कार्मिकों को लगाकर पीबीएम अस्पताल को लाखों का चूना लगाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि जयपुर के महालेखाकार कार्यालय से सेवानिवृत वरिष्ठ लेखाधिकारी नानूराम मेघवाल को नियम विरूद्व महत्वपूर्ण पद पर लगा रखा है। इतना ही नहीं संस्थान द्वारा गवर्निंग काउन्सलिंग में जो फर्म अनुमोदित नहीं है। ऐसे अनेक कार्मिकों की नियुक्ति अपने स्तर पर बिना किसी विज्ञापन निकाले या आवेदन मांग निकाले बिना कर दी गई। मजे की बात तो यह है कि इन कार्मिकों को जो मानदेय का भुगतान किया जा रहा है वह भी अपनी इच्छानुसार किया जा रहा है। जबकि भुगतान राज्य सरकार के निर्देशानुसार या श्रमिक विभाग की विभिन्न तय श्रेणियों के अनुसार निर्धारित मानदेय के अनुसार ही किया जाना चाहिए। लेकिन नानूराम मेघवाल केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से सेवानिवृत होने के बाद भी उन्हें महत्वपूर्ण पद पर लगा रखा है। वहीं उनकी उम्र भी 65 वर्ष से अधिक हो चुकी है। उसके बाद भी उन्हें नियमित रूप से पदस्थापन कर हजारों रूपये प्रतिमाह वेतन दिया जा रहा है। जानकारी में ऐसा भी सामने आ रहा है कि 67 वर्षीय देवकिशन गहलोत नाम के सेवानिवृत्त कार्मिक को भी निदेशक ने नियुक्ति दे रखी है।जबकि शासन सचिव कार्मिक के नियमानुसार 65 वर्ष की आयु के बाद किसी भी कार्मिक को पुन:नियुक्ति नहीं दी जा सकती। यहीं नहीं संविदा पुनर्नियुक्ति के आधार पर लगे व्यक्ति से गोपनीय,संवेदनशील प्रकृति के कार्य,नकदी लेन-देन,चैक बुक लिखना,रोकड़ बही लिखना और रोकडिय़ा इत्यादि का कार्य नहीं करवाया जा सकता। उसके बाद भी निदेशक की ओर से देवकिशन गहलोत को रोकडपाल के रूप में कार्य करवाकर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है
फर्जी तरीके से लगाएं डाटा एंट्री ऑपरेटर-एटेडेन्ट
जानकारी मिली है कि भारत सरकार द्वारा संचालित आईसीएमआर योजना में प्रवीण सोनी नाम के कार्मिक को बतौर डाटा एंट्री ऑपरेटर संविदा पर लगाया गया था। लेकिन प्रवीण सोनी को अब निदेशक ने अपना निजी सहायक के पद पर लगा दिया है। जो इस संस्था में स्वीकृत पद भी नहीं है। मजे की बात तो यह है कि इसके लिये नीति शर्मा द्वारा न तो पीबीएम प्रशासन और न ही मेडिकल कॉलेज प्रशासन से किसी प्रकार की स्वीकृति ली है। इतना ही नहीं राजकीय नियमों की बात करें तो नियमानुसार निदेशक को निजी सहायक रखने का प्रावधान तक नहीं है। सूत्र बताते है कि सोनी निदेशक के कमरे के पास नहीं बल्कि अस्पताल के कमरा नंबर 13 में बैठकर अस्पताल कार्य समय में अन्य कामकाज करता है।
मजे की बात तो यह है कि अस्पताल में डाटा एंट्री आपरेटर का पद स्वीकृत नहीं है। उसके बाद भी दीपिका भोजक नाम की कार्मिक को इस पद पर लगाया गया। जबकि दीपिका से संबंधित कार्य ही नहीं करवाकर महज प्रतिमाह 14 हजार का वेतन दो वर्षों तक देकर धन का अपव्यय किया। जब इसकी शिकायत हुई तो दीपिका को एक प्राइवेट एनजीओ के जरिये अस्पताल में बरकरार रखकर कामकाज करवाकर अस्पताल की गोयनीयता को भंग किया जा रहा है। इतना ही नहीं शबाना नामक कार्मिक को भी एटेडेन्ट पद पर नियुक्ति देकर उक्त कार्य नहीं करवाया जा रहा है और अनावश्यक वेतन दिया जा रहा है।
क्या कहता है नियम
किसी संवर्ग मेें कनिष्ठतम वेतनमान में रिक्तियों को 65 वर्ष से कम आयु के राज्य सरकार के सेवानिवृत्त कर्मचारी से ही भरी जा सकेगी। ऐसे संबंधित कार्मिक की नियुक्ति एक वर्ष के लिये अथवा नियमित कर्मचारी उपलब्ध होने तक जो पहले हो की कालावधि के लिये ही होगी। साथ ही उन्हें गोपनीय महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी नहीं दी जा सकेगी। इसके अलावा राज्य सरकार से सेवानिवृत कर्मचारी को ही लगाये जाने का प्रावधान है।
एक साल पहले दी गई थी शिकायत,कार्रवाई नहीं
हालात यह है कि इसको लेकर एक साल पहले संभागीय आयुक्त से लेकर सीएमओ तक शिकायत दर्ज की जा चुकी है। उसके बाद भी कैंसर अस्पताल प्रबंधन किसी प्रकार की गंभीरता नहीं दिखा रहा है। इतना ही नहीं जनवरी 2026 में जब दूसरी शिकायत हुई तो संभागीय आयुक्त ने सेन्टर की डायरेक्टर नीति शर्मा को जबाब पेश करने के निर्देश दिए थे। उसके उपरान्त भी डायरेक्टर की ओर से किसी प्रकार का जबाब तलब नहीं किया गया।
वे कार्मिक है बिना फर्म अनुमोदित
नर्सिंग स्टाफ 11
सुरक्षा गार्ड 7
चौकीदार 11
अटेडेन्ट 39
ड्राइवर 1
गार्डन 1
डाटा एंट्री ऑपरेटर 2
कम्प्यूटर ऑपरेटर 1
एनटीएस 1




