तेल कंपनियों पर तेजी से बढ़ रहा घाटे का दबाव, जल्द इतने रूपए तक महंगा होने वाला है पेट्रोल-डीजल?

तेल कंपनियों पर तेजी से बढ़ रहा घाटे का दबाव, जल्द इतने रूपए तक महंगा होने वाला है पेट्रोल-डीजल?

राजस्थानी चिराग। देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें फिलहाल स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन हालात तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ आम जनता को राहत देने के लिए सरकार कीमतें नहीं बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर तेल कंपनियों पर घाटे का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति ऐसी बन गई है जिसे आम भाषा में “आगे कुआं, पीछे खाई” कहा जा सकता है। अगर कीमतें बढ़ाई जाती हैं तो महंगाई बढ़ेगी और जनता पर सीधा असर पड़ेगा, और अगर कीमतें नहीं बढ़ाई जाती हैं तो तेल कंपनियों का आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। हाल ही में कच्चा तेल 126 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव और खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से सप्लाई प्रभावित होने का खतरा है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस के व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अगर यहां बाधा आती है तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है, खासकर भारत जैसे देशों पर जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं।

मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। सप्लाई चेन में अस्थिरता के कारण तेल की कीमतों में तेजी आई है, लेकिन भारत में रिटेल कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की जा रही है। इसका सीधा असर तेल कंपनियों पर पड़ रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, तेल कंपनियां पेट्रोल पर लगभग ₹14 प्रति लीटर और डीजल पर ₹18 प्रति लीटर तक का नुकसान उठा रही हैं।

सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि रसोई गैस यानी एलपीजी में भी कंपनियों को भारी घाटा हो रहा है। एलपीजी सिलेंडर को लागत से कम कीमत पर बेचना पड़ रहा है, जिससे करीब ₹80,000 करोड़ तक का संभावित नुकसान हो सकता है। इसके अलावा, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर खाद उत्पादन पर भी पड़ रहा है। यूरिया जैसी खाद बनाने की लागत बढ़ गई है, जिससे सरकार का सब्सिडी बोझ ₹1.71 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.25 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।

यहां ‘अंडर-रिकवरी’ का सिद्धांत समझना जरूरी है। जब किसी उत्पाद को बनाने या खरीदने में ₹100 खर्च होते हैं, लेकिन उसे ₹80 में बेचना पड़ता है, तो ₹20 का जो नुकसान होता है, उसे अंडर-रिकवरी कहा जाता है। फिलहाल तेल और गैस सेक्टर इसी स्थिति से गुजर रहा है।

सरकारी तेल कंपनियां (OMCs) अब इस बढ़ते दबाव को ज्यादा समय तक झेलने की स्थिति में नहीं हैं। अंदरखाने यह बात सामने आ रही है कि कंपनियां कीमतें बढ़ाने की मांग कर रही हैं, क्योंकि लगातार घाटे के चलते उनका वित्तीय संतुलन बिगड़ रहा है। हालांकि सरकार अभी इस मामले में जल्दबाजी नहीं करना चाहती।

सरकार की सबसे बड़ी चिंता महंगाई है। अगर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं तो इसका असर ट्रांसपोर्ट, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा की चीजों पर पड़ता है। इससे आम जनता पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सरकार पहले से ही एलपीजी और खाद पर भारी सब्सिडी दे रही है, ऐसे में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखना उसके लिए एक चुनौती बन गया है।

वैश्विक बाजार में भी हालात चिंताजनक हैं। फरवरी के मुकाबले अप्रैल में पेट्रोल-डीजल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। डीजल की कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है, जबकि पेट्रोल में 60 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। एलपीजी भी 40 प्रतिशत से ज्यादा महंगी हो चुकी है। वहीं, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी फ्लाइट फ्यूल की कीमतें भी लगभग दोगुनी हो गई हैं। युद्ध से पहले कच्चा तेल करीब 73 डॉलर प्रति बैरल था, जो अब 120 डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है।

फिलहाल सरकार ने आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं, लेकिन प्रीमियम पेट्रोल, बल्क डीजल और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए ईंधन के दाम बढ़ाए जा चुके हैं। घरेलू एलपीजी में भी मामूली बढ़ोतरी की गई है। शुरुआत में उम्मीद थी कि कंपनियां अपने पुराने मुनाफे से इस नुकसान को संभाल लेंगी, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है।

अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही स्थिति बनी रहती है और तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर टिकती हैं, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है। सरकार और तेल कंपनियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा, लेकिन जल्द ही कोई बड़ा फैसला सामने आ सकता है।

कुल मिलाकर, तेल बाजार की मौजूदा स्थिति देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है, जिसका असर आने वाले समय में साफ दिखाई दे सकता है।

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